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पीयर थाना में घूसखोरी का खेल उजागर, वीडियो वायरल होते ही मचा हड़कंप

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मुजफ्फरपुर के पीयर थाना में कथित घूसखोरी का मामला सामने आया है। अपर थानेदार पर रिश्वत लेने का आरोप लगा है और वायरल वीडियो के बाद SSP ने जांच के आदेश दे दिए हैं।

मुजफ्फरपुर/आलम की खबर: बिहार में पुलिस विभाग के भीतर पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर लगातार दावे किए जाते रहे हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर सामने आने वाली कुछ घटनाएं इन दावों पर सवाल खड़े कर देती हैं। मुजफ्फरपुर जिले के पीयर थाना से सामने आया ताजा मामला भी कुछ ऐसा ही है, जिसने पूरे पुलिस महकमे में हलचल मचा दी है। यहां एक अपर थानेदार पर रिश्वत लेने का गंभीर आरोप लगा है और इस कथित लेन-देन का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद मामला और भी तूल पकड़ गया है। वीडियो सामने आते ही पुलिस विभाग की कार्यशैली और थाना स्तर पर कथित दलाली तंत्र को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं।

जानकारी के अनुसार, मामला पीयर थाना क्षेत्र के नूनफारा गांव से जुड़ा बताया जा रहा है, जहां एक पुराने केस के सिलसिले में कथित रूप से पैसे की मांग की गई। आरोप है कि इसी केस में मदद और राहत दिलाने के नाम पर एक व्यक्ति से घूस मांगी गई। पीड़ित पक्ष का कहना है कि उनसे लगातार संपर्क कर पैसे देने का दबाव बनाया गया और इस पूरे प्रकरण में थाना से जुड़े एक पुलिस अधिकारी के नाम का इस्तेमाल किया गया। आरोपों के केंद्र में अपर थानेदार अभिनंदन कुमार का नाम सामने आ रहा है, जिन पर यह गंभीर आरोप लगा है कि उन्होंने अपने एक कथित माध्यम के जरिए रुपये मंगवाए।

बताया जा रहा है कि पीड़ित शत्रुघ्न राम ने इस पूरे मामले को उजागर करने का फैसला तब किया, जब उन पर कथित रूप से लगातार दबाव बनाया जाने लगा। उनका आरोप है कि उनसे 5 हजार रुपये की मांग की गई और उन्हें यह भरोसा दिलाया गया कि पैसे देने पर मामले में मदद की जाएगी। आर्थिक तंगी के बावजूद उन्होंने किसी तरह रकम का इंतजाम किया, लेकिन साथ ही यह भी तय किया कि इस कथित भ्रष्टाचार को बेनकाब किया जाएगा। इसी योजना के तहत जब पैसे देने की प्रक्रिया हुई, तो वहां मौजूद एक व्यक्ति ने पूरे घटनाक्रम का वीडियो गुप्त रूप से रिकॉर्ड कर लिया।

यही वीडियो अब सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है और इसी ने पूरे मामले को गंभीर बना दिया है। वायरल क्लिप को लेकर स्थानीय स्तर पर तरह-तरह की चर्चाएं हो रही हैं। दावा किया जा रहा है कि वीडियो में रिश्वत के लेन-देन की झलक दिखाई दे रही है और कथित तौर पर यह भी संकेत मिलता है कि थाना से जुड़े कुछ लोग इस प्रक्रिया में सक्रिय थे। हालांकि, वीडियो की आधिकारिक पुष्टि और फॉरेंसिक सत्यापन अभी जांच का हिस्सा है, लेकिन इसके सार्वजनिक होने के बाद पुलिस विभाग की छवि पर बड़ा सवाल जरूर खड़ा हो गया है।

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इस मामले ने एक बार फिर यह बहस तेज कर दी है कि आखिर थाना स्तर पर दलालों और बिचौलियों का नेटवर्क कैसे सक्रिय रहता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि आम आदमी जब न्याय या राहत की उम्मीद में थाने का रुख करता है, तो कई बार उसे सीधे सिस्टम से ज्यादा ‘सेटिंग’ और ‘सुविधा शुल्क’ की संस्कृति का सामना करना पड़ता है। अगर आरोप सही साबित होते हैं, तो यह सिर्फ एक अधिकारी पर लगे आरोप का मामला नहीं होगा, बल्कि यह उस गहरे जमे अनौपचारिक तंत्र की ओर भी इशारा करेगा, जो कानून व्यवस्था की साख को कमजोर करता है।

पीड़ित पक्ष ने यह भी आरोप लगाया है कि पूरे मामले में झूठे केस और दबाव की रणनीति अपनाई गई, ताकि पैसे की वसूली आसान हो सके। यदि जांच में इस पहलू की पुष्टि होती है, तो मामला और ज्यादा गंभीर हो सकता है, क्योंकि तब यह सिर्फ रिश्वत लेने का मामला नहीं रहेगा, बल्कि कानूनी प्रक्रिया के दुरुपयोग का भी प्रश्न बन जाएगा। ऐसे आरोप आम नागरिकों के भरोसे को गहरी चोट पहुंचाते हैं, क्योंकि पुलिस को कानून के रक्षक के रूप में देखा जाता है, न कि दबाव और वसूली के औजार के रूप में।

गौरतलब है कि पीयर थाना पहले भी विवादों में रह चुका है। हाल के महीनों में यहां से जुड़े कुछ मामलों ने पहले ही थाना की छवि को नुकसान पहुंचाया था। ऐसे में अब यह नया मामला सामने आने के बाद स्थानीय स्तर पर नाराजगी और असंतोष और बढ़ गया है। ग्रामीणों और आसपास के लोगों के बीच यह चर्चा तेज है कि अगर थाना के भीतर ही ऐसी गतिविधियां चलती रहीं, तो आम आदमी न्याय की उम्मीद लेकर कहां जाएगा।

मामले की गंभीरता को देखते हुए मुजफ्फरपुर के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) ने सख्त रुख अपनाया है। पुलिस मुख्यालय तक मामला पहुंचने के बाद साफ संकेत दिया गया है कि अगर वीडियो और आरोपों की पुष्टि होती है, तो दोषियों पर कड़ी कार्रवाई की जाएगी। SSP की ओर से जांच के आदेश दिए जा चुके हैं और संबंधित अधिकारियों को पूरे प्रकरण की तह तक जाने को कहा गया है। इससे यह साफ है कि विभाग इस मामले को केवल वायरल वीडियो की घटना मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहता, बल्कि इसकी संस्थागत सच्चाई भी सामने लाना चाहता है।

जांच के लिए अधिकारियों को निर्देश दिया गया है कि वे स्थानीय स्तर पर तथ्यों, वीडियो, कॉल डिटेल, पैसों के लेन-देन और संबंधित लोगों की भूमिका की बारीकी से पड़ताल करें। इस तरह के मामलों में जांच एजेंसियां आमतौर पर केवल वीडियो पर निर्भर नहीं रहतीं, बल्कि परिस्थितिजन्य साक्ष्य, गवाहों के बयान और इलेक्ट्रॉनिक सबूतों को भी जोड़ती हैं। ऐसे में आने वाले दिनों में यह साफ हो सकेगा कि मामला महज आरोप है या फिर वास्तव में थाना स्तर पर कोई भ्रष्टाचार का संगठित पैटर्न काम कर रहा था।

फिलहाल यह मामला पूरे जिले में चर्चा का विषय बना हुआ है और लोगों की निगाहें अब जांच रिपोर्ट पर टिकी हैं। अगर जांच निष्पक्ष और सख्ती से हुई, तो यह केवल एक अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई भर नहीं होगी, बल्कि थाना स्तर पर फैले दलाली और भ्रष्टाचार के नेटवर्क पर भी एक बड़ा संदेश जाएगा। वहीं, यदि आरोपों के बावजूद ढीली कार्रवाई हुई, तो यह आम लोगों के भरोसे को और कमजोर कर सकता है। ऐसे में अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या इस बार सिस्टम अपने ही भीतर छिपी सड़ांध पर सच में चोट करेगा, या मामला कुछ दिनों की सुर्खियों तक सीमित रह जाएगा।

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